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QUIZ FOR NET EXAM PAPER 1

यदि आप भविष्य में नेट का पेपर देना चाहते हैं तो उसके लिए आपको रोजाना क्विज देना पड़ेगा और डिटेल में हर कांसेप्ट को पढ़ना पड़ेगा इसके लिए आपको हम 1 चैनल का नाम बताने जा रहे हैं जो आपको क्विज देकर आप की प्रैक्टिस को और मजबूत कर देगा तो यदि आप क्विज देने में इच्छुक है तो चैनल में जाकर क्विज रोजाना दें और अपनी प्रगति को देखें  https://t.me/nta_net_Jrf_paper1 और पेपर 2 कामर्स की की तैयारी करना चाहते हैं तो हम आपको एक और चैनल का नाम बताने जा रहे हैं जिसम जाकर आप रोजाना प्रश्न का लाभ उठा सकते हैं और साथ-साथ अन्य लोगों से उनकी राय ले सकते हैं। https://t.me/CommerceTargetJRF यदि आप किसी और सरकारी पेपर से संबंधित टेलीग्राम पर चैनल का नाम जानना चाहते हैं तो हमें कमेंट में बताएं हम आपको सबसे श्रेष्ठ चैनल का नाम जल्द बताने की कोशिश करेंगे

Five sentences about cow// five lines on my cow

1. I have a cow. 2. It has two eyes. 3. It has a long tail. 4. It likes to eat green grass. 5. I like its milk.

हाँ मैं भी किसान हूँ

हाँ मैं भी किसान हूँ हाँ मै भी किसान हूँ धरा का सीना चीर बीज बोता हूँ पूस की रातों में खेतों पर मैं सोता हूँ फसलों को अपनी मैं कीट और जानवरों से बचाता हूँ मई,जून की धूप अगस्त की बरखा सब आसानी से सहता हूँ लेकिन हर बार सियासत में क्यों मुज़रिम बन जाता हूँ रोटी,कपड़ा,मकां को किसान होकर भी तरस जाता हूँ आज का युवा किसान शहरों की ओर रुख मोड़ गया लहलहाती फसलों की भूमि को बंजर बना कर छोड़ गया बापस लाकर उन्हें शहर से हरियाली वही चाहता हूँ नई तकनीक से अब मैं भी फसलें खूब उगाता हूँ लेकिन कृषि कानून से मैं भी बहुत परेशान हूँ कहने को छोटा ही सही हाँ मैं भी एक किसान हूँ अन्नदाता कहकर अब हमसे दाना छीन रहे आने वाली नस्लों का क्यों खेती से मुख मोड़ रहे दिखाकर तानाशाही क्यों किसानों का गला दबाया है देखकर कृषि कानून किसान खून के आंसू रोया है देश में लूट जैसी योजनाओं से मैं भी क्या अन्जान हूँ अधिकार अपना लेकर रहेंगे हाँ मैं भी एक किसान हूँ

पड़ाव मिलेगा

जब तक चलेंगी ज़िन्दगी की सांसे, कहीं प्यार कहीं टकराव मिलेगा। कहीं बनेंगे सम्बन्ध अंतर्मन से तो, कहीं आत्मीयता का आभाव मिलेगा। कहीं मिलेगी ज़िन्दगी में प्रशंसा तो, कहीं नाराजगियों का व्यवहार मिलेगा। कहीं मिलेगी सच्चे मन से दुआ तो, कहीं भावनाओं में दुर्भाव मिलेगा। कहीं बनेगें पराए रिश्ते भी अपने तो, कहीं अपनों से ही खिंचाव मिलेगा। कहीं होंगी खुशामदें चेहरे पर तो, कहीं पीठ पर बुराई का घाव मिलेगा। तू चला चल राही अपने कर्म पथ पर, जैसा तेरा भाव वैसा प्रभाव मिलेगा। रख स्वभाव में शुद्धता का 'स्पर्श' तू, अवश्य ज़िन्दगी का पड़ाव मिलेगा।

जिंदगी

जिंदगी में हर कठिनाई को सहना पड़ता है, जिस हाल में हैं उसी हाल में रहना पड़ता है। ये ज़िन्दगी बरसात के पानी की तरह है, जिसे वक्त के बहाव के साथ बहना पड़ता है। चाहें कितने ही बुलंद हो इरादे, एक दिन उन्हें भी डगमगाना पड़ता है। दिल के संमन्दर में जब इश्क उठने लगे, तब शर्म के पल्ले को भी हटाना पड़ता है। चाहें कितनी भी धन दौलत हो पास, एक दिन उसे छोंड़ इस जहां से जाना पड़ता है। कितना भी दिल का कठोर हो इंसा, उसके आसुंओं को आंख से बह जाना पड़ता है। कितना भी ज्ञानी हो कोई आज के जमाने में, उसे भी जीवन पर्यंत सीखना पड़ता है।

परंपराएं क्या सही होती है

परंपराएं मनुष्यों का मनुष्यो पर विश्वास तब होता है जब परंपराओं का वहन किया जाता है। परंपराएं परंपराएं आम के फल की भांति होती है जन्म के समय सबको कड़वी लगती है । कुछ समय बाद खट्टा स्वाद देता है जिससे खटाई प्रिय हो वह उसका स्वीकार कर लेता है और फिर कुछ समय पश्चात वहीं फल सबको मधुर लगने लगता है और सबका प्रिय बन जाता है किंतु एक समय आने के बाद वह गल जाता है उसमें से दुर्गंध आने लगती है खाने वाले को रोग लग जाता है और अंत में रह जाती है सुखी गुठली। और वह फल की सूखी गुठली किसी के काम नहीं आता। मुझे परंपराओं से कोई विरोध नहीं है किंतु परंपराएं जब शोषण का कारण बन जाए , सुख के बदले दुख देने लगे तो उस परंपरा को भूमि में गाड़कर नई परंपरा को जन्म देना ही होता है। अब कौन सी परंपरा सही है और कौन सी परंपरा गलत यह निश्चित कौन करता है आप या मैं? जी नहीं !! समय निश्चित करता है और समय का विधान सब को मानना पड़ता है और समय के इस चक्र में आप किस पक्ष में होंगे इसका निर्णय आपको करना है । क्योंकि समय की चक्की में सब पीस जाते हैं। अधर्म के मार्ग पर चलने वाले इस परिवर्तन का आरंभ करते हैं और धर्म...

बेटियाँ

ज़िम्मेदारी के बोझ तले, दब रही हैं आजकल बेटियाँ। नम आँखों से फ़ोन पर, पीहर में हँसकर बात करती हैं बेटियाँ। हुआ करती थीं कभी माँ-बापू की जान, आज अकेले ही सब दुःख सहती हैं बेटियाँ। मन पीहर में शरीर ससुराल में, ये कभी जताती नही हैं बेटियाँ। पीहर आने के लिए , आजकल कितनी तरसती हैं बेटियाँ। घर गृहस्थी बसाने में ही, दिन रात लगी रहती हैं बेटियाँ। ससुराल की सभी परेशानी, Similar poem https://kavitaunsune.blogspot.com/2020/05/blog-post_21.html क्यों चुपचाप सहती हैं बेटियाँ। क्यों अपनी इच्छाओं का गला घोटकर, संस्कारी बन जाती हैं बेटियाँ। कभी बेटों को भी सिखाओ संस्कार, मान मर्यादा के लिए जान गवाती हैं बेटियाँ। कर लेते हैं मस्ती और पार्टी बेटे, घर से भर क़दम भी नही रखती हैं बेटियाँ। दिन में आराम कर लेते हैं बेटे, दो मिनट सुस्ताती भी नही हैं बेटियाँ। पीहर में कुछ हो जाए तो, सब कुछ छोड़ घर आती हैं बेटियाँ। अफ़सोस! कितना कुछ सह कर, चुपचाप दुनिया से चली जाती हैं बेटियाँ।

करोना वायरस पर दमदार कविता

जनवरी बीता खुशियों में, फरबरी में खुमारी छाई। मार्च बीता डर-डर कर, अप्रैल में लॉक डाउन की बारी आई। कोरोना ने देश में तबाही मचाई, घर में रहने से लोगों में उम्मीद जगाई। मई में कोरोना ने गति बढ़ाई, फिर अम्फान तूफ़ान ने तबाही मचाई। जून में अनलॉक वन आया, साथ में निसर्ग तूफ़ान लाया। जुलाई में शायद मिले कुछ आज़ादी, अन्न की न करना अब बर्बादी। More poems on corona virus https://kavitaunsune.blogspot.com/2020/05/blog-post_20.html अगस्त में भाई बहन होंगे साथ, होंगे बहन भाई के हाथों में हाथ। सितम्बर तक भाग जाए कोरोना शैतान, फिर शायद ज़िन्दगी हो जाए कुछ आसान। अक्टूबर करेंगे कोरोना वारियर्स को समर्पित, देश के सभी योद्धाओं को अर्पित। नवम्बर में हम सब फिर होंगे साथ, मिलकर दीपक जलाएंगे दिवाली की रात। दिसम्बर में करेंगे ईश्वर से प्राथना, आए न कोई भी वर्ष फिर ऐसा अपना। (मान सिंह कश्यप रामपुर उ०प्र०)

पर्यावरण सन्देश

जन-जन तक सन्देश फैलाएं मिलकर हम सब पर्यावरण बचाएं मिलकर सब एक कदम उठाएं वाहनों पर अंकुश लगाएं एक सुन्दर सा देश बनाएं कट रहे हैं जंगल वन शिथिल पड़ गया है मानव मन ज़हरीली हो गई हैं फिजाएं मिलकर हम सब पर्यावरण बचाएं प्लास्टिक का उपयोग छोंड़ दें सब पैदल की ओर रुख मोड़ दें सब हवा चाहिए सबको शुद्ध इसके लिए आपस में करते हैं युद्ध वृक्ष न कोई लगायेगा लेकिन मीठे फल पहले खायेगा चलो शरीर को स्वास्थ्य बनाएं जन-जन तक एक संदेश फैलाएं पुष्प सभी के मन को भाते हैं फिर भी मनुष्य पेड़ नही लगाते हैं ऐसे ही जल को व्यर्थ गवांओगे एक दिन जल के लिए तरस जाओगे हाथी जैसे जानवर को बारूद तुम खिलाओगे एक दिन फिर तुम भी जानवर बन जाओगे हम सब प्रकृति का सम्मान करें पर्यावरण का मिलकर अब ध्यान करें जन-जन तक एक सन्देश फैलाएं मिलकर हम सब पर्यावरण बचाएं (मान सिंह कश्यप रामपुर उ०प्र०)

स्त्री

संसार की अज़ब रचना है स्त्री, एक क़िताब की तरह होती हैं स्त्री। सभी की अपनी-अपनी जरूरतें, ज़िन्दगी में बन जातीं है स्त्री। कोई न समझ सके वो, गणित वाली क़िताब हैं स्त्री। जिसकी जैसी ज़रूरत, बैसी क़िताब हैं स्त्री। कभी नीरस सा उपन्यास, कभी प्रेमचंद की कहानी है स्त्री। कभी शेक्सपीयर का ड्रामा, कभी कौटिल्य का अर्थशास्त्र हैं स्त्री। किसी के लिए रद्दी वाली, फ़िजूल की क़िताब हैं स्त्री। किसी के लिए ज़िन्दगी के, हसीन और रंगीन पन्ने हैं स्त्री। किसी के घर के पुस्तकालय में, संजोकर रखी क़िताब हैं स्त्री। किसी बड़े लेखक के कविता के, सुन्दर और मनमोहक लफ्ज़ हैं स्त्री। कुछ के लिए मंदिर में रखी, पवित्र वेद पुराण की क़िताब हैं स्त्री। किसी के लिए पाक क़ुरान, और बाईबल की क़िताब हैं स्त्री। सच कहें तो संतो की वाणी, कबीर के दोहे जैसी सरल हैं स्त्री। पढ़ता नही कोई मन की आँखों से, पढ़ने पर समझ में आती हैं स्त्री। जो भावनाओं को समझता है इनकी, जीवन में उसके उतर जातीं हैं स्त्री। छुए तन में एक अनछुआ मन लिए, किसी कोने में पढ़ी क़िताब हैं स्त्री। (मान सिंह कश्यप रामपुर उ०प्र०)

मनुष्य और इंसानियत

अन्जान लोगों की मदद का, अभी अरमान बचा है। कितनों के अंदर अभी भी, एक नेक इंसान बचा है। अज़ब-गज़ब दुनिया का, यहाँ कानून बचा है। देश के वादे वाला नेता, अब यहाँ बेईमान बचा है। मुश्किलों में फ़ेर लीं , गरीबों से सभी ने निग़ाहें। अपने शहरों में अब, हर शख़्स अन्जान बचा है। करोड़ों हैं इंसान यहां, उनका कोमल सा हृदय, इस बेरुख़ी के देश में, अब तक सोनू जैसा इंसान बचा है। माना कि इस महामारी में, बहुत परेशानियां हैं मगर। लोगों में कुछ तो उम्मीद वाकी है, कुछ तो अरमान बचा है। क्यों दिखाते हो गरीबों को, उनके गरीब होने डर। इन गरीबों में भी अभी, बहुत सा अरमान बचा है। (मान सिंह कश्यप रामपुर उ०प्र०)

मज़बूर-मजदूर करोना वायरस का मजदूरों पर प्रभाव

मज़बूर-मजदूर माना कि मज़दूर थे , अपने शहर से दूर थे। घर चलाने के लिए वो, दूर जाने को मज़बूर थे। बेरोज़गारी की बजह से, अपने परिवार से दूर थे। मालिक और नेता सभी, अपनी ख़ुशी में मग़रूर थे। आख़िर कब तक भटकते रहेंगे, राजनीति के अंधियारों में। सूरज जैसी रौशनी भर दो, कोई तो इनके जीवन के सितारों में। देखें कोरोना पर और कविता  kavitaunsune.blogspot.com पर https://kavitaunsune.blogspot.com/2020/06/blog-post_6.html स्याह रात भर कितनों की ज़िंदगी, मचलती है सड़कों पर नंगे बदन। इनके परिवारों से मिलाकर इन्हें, कोई तो कर दो इनको मग्न। क्यों ग़रीबी मुक्त भारत का नारा, नेता देतें हैं अनेक सेमिनारों में। सपनों में अमीर होते-होते गरीब, बिक चुकें है पथ के बाज़ारों में। एक ज़माना गुज़र गया उन्हें, घर का बना खाना खाने में। माँ के साथ रात को बैठकर, जीवन की सारी बातें बतलाने में। आज के कठिन दौर में, शहरों से निकाला मक्कारों ने। बेबसी में मज़बूर-मज़दूर, चल दिए पैदल ही अंगारों में। कब तक थमेगा ज़िन्दगी का दौर, कब तक कितना पैदल चलेंगे और। इनकी भी मजबूरियों पर, साहब क्यों नही करते ...

शहीद जवान(विदाई)

कौन कहता है कि, बेटे विदा नहीं होते। जब होते हैं विदा, तब सभी हैं रोते। बेटियाँ तो विदा होकर, पा लेती हैं दूसरा परिवार। बेटे जब विदा होते हैं, तो छोड़ जाते है संसार। कौन कहता है कि, बेटे विदा नहीं होते। बेटियों का दो घरों पर, हो जाता है अधिकार। बेटे सरहद पर रात भर, घर आने का करते हैं विचार। माना कि बेटियों के आने से, घर जाता है चहक। वर्षों बाद बेटों के आने पर भी, गली,गांव,आँगन जाता है महक। कौन कहता है कि, बेटे विदा नही होते। बेटियों की विदाई से, खुश होता है परिवार। बेटों की विदाई में, टूट जाता है परिवार। बेटियों को पीहर में, मिलता है स्नेह और प्यार। बेटों को सरहद पर, मिलते हैं हथियार। कौन कहता है कि, बेटे विदा नहीं होते। बेटियों ने अगर घर को, खुशियों से सजाया। बेटों ने भी देश की रक्षा में , अपनी जान को है गवाया। बेटियाँ तो त्यौहार को, परिवार संग है मनाती। बेटों की तो रातों की, नींद है उड़ जाती। कौन कहता है कि, बेटे विदा नहीं होते। कभी-कभी बेटे भी, ऐसे है विदा होते। घर वालों चेहरा भी, नही हैं दिखा पाते। कुछ सोते हुए, सोते ही हैं रह जाते। कु...

. मेरी माँ

मेरी माँ मेरी नीदों के ख्याबों में, तुम छुपी हो माँ। मेरे लबों की हंसी में, तुम छुपी हो माँ। मेरे दिल की धड़कन में, तुम बसी हो माँ। मेरे ख्याबों का छोटा सा, संसार हो तुम माँ। मेरे जीवन का सम्पूर्ण , आधार हो तुम माँ। इस सृष्टि का , संसार हो तुम माँ। इस सुन्दर दुनिया को, तुमने मुझे दिखाया माँ। दुआओं के साथ तुम्हारी, मैं आगे बढ़ पाया माँ। दिन तुम्हारा आज भी, रसोई में बीतता है माँ। खाना तुम्हारे हाथ का, आज भी याद आता है माँ। थक हार जब भी घर आता था, आँचल तुम्हारा ही पाता था माँ। अब तो बस याद ही आती है, तुम्हारी याद बहुत रुलाती है माँ। कल ड्यूटी से देर से आया था, खाना नही खाया था माँ। याद तुम्हारी तब आयी, रातों को मेरे लिए खाना बनाया था माँ। तुम हिंदी जैसी सरल, स्वभाव थी माँ। चटनी रोटी भी तुम्हारे हाथ की, बहुत मुझे भाती थी माँ। कभी-कभी अब बिना खाए,  सो जाता हूं माँ। याद तुम्हे करके , कितनी बार रो जाता हूं माँ। कितने भी दुःख दर्द हों, चुपचाप तुम सह लेती हो माँ। लगने पर मुझे चोट, छुपके तुम रो लेती हो माँ। मेरे खातिर कितनी ही,  रातों को तुम ज...

दिल की बात

अगले जन्म तुम मेरी बनना, इस आस में जीवन बीत रहा। अपने मन को मारकर, हृदय नए सपनों को सींच रहा। गुज़र रहा है जीवन अब तो, बस दूर से प्रीत निभाने में। अपने सपनों में हर दिन तेरा, सुन्दर प्रतिबिम्ब बनाने में। मेरा हृदय अब मुझसे ही, मुझको है अब जीत रहा। अगले जन्म तुम मेरी बनना, इस आस में जीवन बीत रहा। न मुझको दुःख किसी बात का होगा, उम्मीदों ने मुझको सर्व दिया। शब्द दिए मुझको कविता के, और तुम्हारे जैसा पर्व दिया। मोह की धुन में मन बावरा बस, गीत प्रेम के गुनगुनाता रहा। अगले जन्म तुम मेरी बनना, इस आस में जीवन बीत रहा। क्या समझेंगे लोग यहाँ के, फ़ौजी दिल की बातों को। रातों से लंबे दिन लगते हैं, और जिम्मेदारी की रातों को। स्मृति में तुम्हारी ये मन मेरा, दिन रात की ड्यूटी सींच रहा। अगले जन्म तुम मेरी बनना, इस आस में जीवन बीत रहा। कभी तो सुनेगा कोई हमारी , मुझको है ये आस बहुत। धीरे-धीरे अब जान निकलती, आती नही अब सांस बहुत। अपना था लक्ष्य एक,  कोई और हमसे जीत रहा। अगले जन्म तुम मेरी बनना, इस आस में जीवन बीत रहा। (सेना शिक्षा अनुदेशक मान सिंह कश्यप राम...

मानव और पर्यावरण

ए-मानव बता अब क्या कहूं, दिन कहूं या रात कहूं। बिन मौसम की बरसात कहूं, ख़ुशी कहूं या गम कहूं। बिन तेरे ए-हयात, मानव को अब क्या कहूं। मर्ज कहूं,या प्रकृति बहार कहूं, दुःख कहूं मानव मन का,या त्यौहार कहूं। पर्यावरण संतुलन कहूं, या मानव का संहार कहूं। कैद से आने का इंतज़ार कहूं, या प्रकृति का सोलह श्रृंगार कहूं। ए-मानव बता अब क्या कहूं, दिन कहूं या रात कहूं। मानव को,कोरोना का रोना कहूं, या सजती प्रकृति को सोना कहूं। ईश्वर का श्राप कहूं, या पर्यावरण का अभिशाप कहूं। तेरा तुझको अभिमान कहूं, या ईश्वर का वरदान कहूं। मानव तेरी गलतियों को, देख मैं इस प्रकार कहूं। मानव को बड़ा घमंड था, सर पर पाप का प्रचंड था। अपने आप में उदंड था, मानवता को कर रहा खंड-खंड था। प्रकृति सारी त्रस्त थी, सड़कें भी सारी व्यस्त थी। विश्व के जंगलों में लगी आग थी, हवाओं में फ़ैली जहरीली ख़ाक थी। संसार में कोलाहल का स्वर था, खतरे में पर्यावरण का घर था। विधु के जैसे चेहरे थे, धरा के दुःख दर्द बड़े गहरे थे। अचानक से फिर एक संकट आया, हयात का अंतिम पैग़ाम लाया। पूरे लोक को खूब डराया, ये देख विज्ञान...

यादों का दौर

वो नब्बे का दशक कितना सुहाना था, एक ख़त का ही तो जमाना था। न फेसबुक न व्हाट्सएप, सब तरफ खुशियों को आना था। हाथ में तख़्ती कपडे का बस्ता, कभी ख़ुशी तो कभी मार से स्कूल जाना था। लड़ना,झगड़ना फिर मिल जाना था, वो दोस्ती का मौसम सुहाना था। कहीं चुपके से तकते दो नयन, दिल उन नयनों का दीवाना था। वो नब्बे का दशक कितना सुहाना था, वस एक ख़त का ही तो जमाना था। गली में मिलीं अचानक नज़रें, उन नज़रों को देख भागकर छुप जाना था। वो बचपन वाले खेल में, उसे हर दफ़ा बचाना था। विद्यालय से निकल जब स्कूल में आया था, छोटे से ह्रदय ने जोर का झटका खाया था। देखकर उसको स्कूल में मन हर्षाया था, लगा देखने नयनों को देखकर चैन आया था। चला नही ये सिलसिला ज़्यादा लम्बा, किसी और ने उस पर अपना रौब जमाया था। याद हैं मुझको आज भी, उसके लम्बे केश और किसी को ढूंढते नयन। सोच कर उस दौर को , क्यों ह्रदय हो जाता है बेचैन। जाते-जाते उसने इशारों से बतलाया था, बनोगे कुछ ज़िन्दगी में मुझको समझाया था। कोई कमी अब न बाकी है, ख्याब न कोई है अब अधूरा। फिर भी उसकी यादों का, हर दिन लगता है एक नया सवेरा। व्याकुल होकर मन क...

इंसानियत

मंडरा रहा जबकि हमारे सर पर भी मौत का भयानक साया है एक तरफ हाय ! कोरोना के कहर ने , देश में लोगों को रूलाया है । दूसरी ओर इंसानियत के दुश्मनों ने, सर सांपों सा अपना उठायाहै॥  बना रहे तरकीवें नई - नई , बनें अमीरजादे रातों - रात वो कैसे नकली सामान बनाने का, बिन सोचे - समझे कारखाना लगाया है।। समझ उनको नहीं शायद , कि दे रहे किस काम को वे अंजाम । इन्सानियत के दुश्मन बनकर, खिलवाड़ करने का मन बनाया है । । खुदा ने दिया है खुद हमको अवसर, नेकी करके पन्य कमाने का । वाह री इन्सानों की जात ! मौका हाथों से वो भी गंवाया है । । हर तरफखुद की जिंदगी , बचाने की लगी है मुशक्कतों से होड़ । और हमने धर्म - कर्म - सत्कर्मों के आंचल को दागदार बनाया है ।। आखिर क्यूं हमारी इंसानियत यारों ! भरने लगती है पानी । मंडरा रहा जबकि हमारे सर पर भी , मौत का भयानक साया है । । संभल सकते हो तो संभल जाओ , है वक्त अभी भी परीक्षा भरा । नतीजा निकले चाहे कुछ भी , मन को मगर क्यूं न साफ बनाया है।। हमारे हर कर्म की हस्ती पर , सूक्षम निगाह हर पल परमपिता की । जिसने दिया जन्म हम सब को , सारी कायनात को बसाया है । । वो चाहे तो...

कहानी स्टूडेंट की

ज़िन्दगी में भारी घमासान है, दुविधा में फंसा ये "मान" है। कहानी स्टूडेंट की लिखने पर ही ध्यान है, स्टूडेंट की ज़िंदगी आज भी बेजान है। न रात नींद में सो पाते, न दिन को खाना खा पाते। दिन गणित से शाम तर्क शक्ति तक पहुंच जाती है, फेल हो जाने पर शादी की धमकी दी जाती है। ज़िन्दगी की पूरी हंसी GK ने चुराई है, इसे दिन रात पढ़ने में ही भलाई है। Antonyms से लेकर, synonyms तक Error ढूंढते हैं। सच बताऊं तो खुद की शक्ल के लिए, बेचारे Mirror ढूंढते हैं। एक औरत भी दूसरे की तरफ, इसारे से रिश्ता समझाती है। ये कैसी Reasoning है भाई, जो भूले रिश्ते भी याद दिलाती है। कहीं नल से टंकी भरी जाती है, तो कहीं दूध में पानी की मिलावट है।  क्या कोई धारा के विपरीत जाता है, या केवल यह दिखावट है। क्या जरुरत थी अंग्रेंजो को भारत आने की, मुहमद गौरी को पृथ्वी राज से भिड़ जाने की। ऐसी भी क्या जरुरत थी, चक्रवृद्धि ब्याज पर कर्ज लेने की। एक ही ट्रैक पर पचास की स्पीड से, दोनों ट्रेनों को आने की। क्या जरुरत थी नौकरी में , जाति के बंटवारे की। दो हज़ार किमी दूर जाकर , लटक कर परीक्षा दे आने ...

कोरोना

विश्व में महामारी छायी है, कोरोना नाम की कोई बीमारी आयी है। पूरा विश्व इस बीमारी से परेशान है, हजारों लोगों ने गवाई अपनी जान है। सूनी गलियां,सूने रास्ते, खाली खेल के मैदान हैं, जागरूकता ही अब समस्या का समाधान है। घर ही मैदान पिकनिक स्पॉट बनाया है, समझदारी से यही सुझाव सामने आया है। डा० ने कोरोना के कुछ लक्षण को बतलाया है, खाँसी, छींक,जुकाम, तेज़ ज्वर को बताया है। छोटा,बड़ा,अमीर,गरीब सब पर इसकी मार है, एक से दूजे में जाने के लिए कोरोना बेकरार है। कुछ दिन परिवार के साथ घर में बिताइए, समझदारी से कोरोना को देश से भगाइए। अहम,बहम और भ्रम से खुद को बचाना है, पास पड़ोस में प्यार से समझाना है। कोरोना से विश्व की जंग जारी है, वैक्सीन,दवाएं बनाने की तैयारी ही। समय-समय पर सेनेटाइजर से हाथ है धोना, भीड़ वाले इलाके से बचना और बचना। पहले से ही लोगों में थी दिलों की दूरियाँ, अब कैसी फैलाई कोरोना ने ये मजबूरियाँ। कैसा आया बीसबें वर्ष का ये दौर, सचेत होकर करें इस विषय पर गौर। शव-ए-बारात में परिवारों ने जान छुड़ाई है, दुःख की घडी में डॉक्टरों ने हिम्मत दिखाई है। "मान" के ...