मनुष्य और इंसानियत



अन्जान लोगों की मदद का,
अभी अरमान बचा है।
कितनों के अंदर अभी भी,
एक नेक इंसान बचा है।

अज़ब-गज़ब दुनिया का,
यहाँ कानून बचा है।
देश के वादे वाला नेता,
अब यहाँ बेईमान बचा है।

मुश्किलों में फ़ेर लीं ,
गरीबों से सभी ने निग़ाहें।
अपने शहरों में अब,
हर शख़्स अन्जान बचा है।

करोड़ों हैं इंसान यहां,
उनका कोमल सा हृदय,
इस बेरुख़ी के देश में,
अब तक सोनू जैसा इंसान बचा है।

माना कि इस महामारी में,
बहुत परेशानियां हैं मगर।
लोगों में कुछ तो उम्मीद वाकी है,
कुछ तो अरमान बचा है।

क्यों दिखाते हो गरीबों को,
उनके गरीब होने डर।
इन गरीबों में भी अभी,
बहुत सा अरमान बचा है।

(मान सिंह कश्यप रामपुर उ०प्र०)

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