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बेटियाँ

ज़िम्मेदारी के बोझ तले, दब रही हैं आजकल बेटियाँ। नम आँखों से फ़ोन पर, पीहर में हँसकर बात करती हैं बेटियाँ। हुआ करती थीं कभी माँ-बापू की जान, आज अकेले ही सब दुःख सहती हैं बेटियाँ। मन पीहर में शरीर ससुराल में, ये कभी जताती नही हैं बेटियाँ। पीहर आने के लिए , आजकल कितनी तरसती हैं बेटियाँ। घर गृहस्थी बसाने में ही, दिन रात लगी रहती हैं बेटियाँ। ससुराल की सभी परेशानी, Similar poem https://kavitaunsune.blogspot.com/2020/05/blog-post_21.html क्यों चुपचाप सहती हैं बेटियाँ। क्यों अपनी इच्छाओं का गला घोटकर, संस्कारी बन जाती हैं बेटियाँ। कभी बेटों को भी सिखाओ संस्कार, मान मर्यादा के लिए जान गवाती हैं बेटियाँ। कर लेते हैं मस्ती और पार्टी बेटे, घर से भर क़दम भी नही रखती हैं बेटियाँ। दिन में आराम कर लेते हैं बेटे, दो मिनट सुस्ताती भी नही हैं बेटियाँ। पीहर में कुछ हो जाए तो, सब कुछ छोड़ घर आती हैं बेटियाँ। अफ़सोस! कितना कुछ सह कर, चुपचाप दुनिया से चली जाती हैं बेटियाँ।

करोना वायरस पर दमदार कविता

जनवरी बीता खुशियों में, फरबरी में खुमारी छाई। मार्च बीता डर-डर कर, अप्रैल में लॉक डाउन की बारी आई। कोरोना ने देश में तबाही मचाई, घर में रहने से लोगों में उम्मीद जगाई। मई में कोरोना ने गति बढ़ाई, फिर अम्फान तूफ़ान ने तबाही मचाई। जून में अनलॉक वन आया, साथ में निसर्ग तूफ़ान लाया। जुलाई में शायद मिले कुछ आज़ादी, अन्न की न करना अब बर्बादी। More poems on corona virus https://kavitaunsune.blogspot.com/2020/05/blog-post_20.html अगस्त में भाई बहन होंगे साथ, होंगे बहन भाई के हाथों में हाथ। सितम्बर तक भाग जाए कोरोना शैतान, फिर शायद ज़िन्दगी हो जाए कुछ आसान। अक्टूबर करेंगे कोरोना वारियर्स को समर्पित, देश के सभी योद्धाओं को अर्पित। नवम्बर में हम सब फिर होंगे साथ, मिलकर दीपक जलाएंगे दिवाली की रात। दिसम्बर में करेंगे ईश्वर से प्राथना, आए न कोई भी वर्ष फिर ऐसा अपना। (मान सिंह कश्यप रामपुर उ०प्र०)

पर्यावरण सन्देश

जन-जन तक सन्देश फैलाएं मिलकर हम सब पर्यावरण बचाएं मिलकर सब एक कदम उठाएं वाहनों पर अंकुश लगाएं एक सुन्दर सा देश बनाएं कट रहे हैं जंगल वन शिथिल पड़ गया है मानव मन ज़हरीली हो गई हैं फिजाएं मिलकर हम सब पर्यावरण बचाएं प्लास्टिक का उपयोग छोंड़ दें सब पैदल की ओर रुख मोड़ दें सब हवा चाहिए सबको शुद्ध इसके लिए आपस में करते हैं युद्ध वृक्ष न कोई लगायेगा लेकिन मीठे फल पहले खायेगा चलो शरीर को स्वास्थ्य बनाएं जन-जन तक एक संदेश फैलाएं पुष्प सभी के मन को भाते हैं फिर भी मनुष्य पेड़ नही लगाते हैं ऐसे ही जल को व्यर्थ गवांओगे एक दिन जल के लिए तरस जाओगे हाथी जैसे जानवर को बारूद तुम खिलाओगे एक दिन फिर तुम भी जानवर बन जाओगे हम सब प्रकृति का सम्मान करें पर्यावरण का मिलकर अब ध्यान करें जन-जन तक एक सन्देश फैलाएं मिलकर हम सब पर्यावरण बचाएं (मान सिंह कश्यप रामपुर उ०प्र०)

स्त्री

संसार की अज़ब रचना है स्त्री, एक क़िताब की तरह होती हैं स्त्री। सभी की अपनी-अपनी जरूरतें, ज़िन्दगी में बन जातीं है स्त्री। कोई न समझ सके वो, गणित वाली क़िताब हैं स्त्री। जिसकी जैसी ज़रूरत, बैसी क़िताब हैं स्त्री। कभी नीरस सा उपन्यास, कभी प्रेमचंद की कहानी है स्त्री। कभी शेक्सपीयर का ड्रामा, कभी कौटिल्य का अर्थशास्त्र हैं स्त्री। किसी के लिए रद्दी वाली, फ़िजूल की क़िताब हैं स्त्री। किसी के लिए ज़िन्दगी के, हसीन और रंगीन पन्ने हैं स्त्री। किसी के घर के पुस्तकालय में, संजोकर रखी क़िताब हैं स्त्री। किसी बड़े लेखक के कविता के, सुन्दर और मनमोहक लफ्ज़ हैं स्त्री। कुछ के लिए मंदिर में रखी, पवित्र वेद पुराण की क़िताब हैं स्त्री। किसी के लिए पाक क़ुरान, और बाईबल की क़िताब हैं स्त्री। सच कहें तो संतो की वाणी, कबीर के दोहे जैसी सरल हैं स्त्री। पढ़ता नही कोई मन की आँखों से, पढ़ने पर समझ में आती हैं स्त्री। जो भावनाओं को समझता है इनकी, जीवन में उसके उतर जातीं हैं स्त्री। छुए तन में एक अनछुआ मन लिए, किसी कोने में पढ़ी क़िताब हैं स्त्री। (मान सिंह कश्यप रामपुर उ०प्र०)

मनुष्य और इंसानियत

अन्जान लोगों की मदद का, अभी अरमान बचा है। कितनों के अंदर अभी भी, एक नेक इंसान बचा है। अज़ब-गज़ब दुनिया का, यहाँ कानून बचा है। देश के वादे वाला नेता, अब यहाँ बेईमान बचा है। मुश्किलों में फ़ेर लीं , गरीबों से सभी ने निग़ाहें। अपने शहरों में अब, हर शख़्स अन्जान बचा है। करोड़ों हैं इंसान यहां, उनका कोमल सा हृदय, इस बेरुख़ी के देश में, अब तक सोनू जैसा इंसान बचा है। माना कि इस महामारी में, बहुत परेशानियां हैं मगर। लोगों में कुछ तो उम्मीद वाकी है, कुछ तो अरमान बचा है। क्यों दिखाते हो गरीबों को, उनके गरीब होने डर। इन गरीबों में भी अभी, बहुत सा अरमान बचा है। (मान सिंह कश्यप रामपुर उ०प्र०)

मज़बूर-मजदूर करोना वायरस का मजदूरों पर प्रभाव

मज़बूर-मजदूर माना कि मज़दूर थे , अपने शहर से दूर थे। घर चलाने के लिए वो, दूर जाने को मज़बूर थे। बेरोज़गारी की बजह से, अपने परिवार से दूर थे। मालिक और नेता सभी, अपनी ख़ुशी में मग़रूर थे। आख़िर कब तक भटकते रहेंगे, राजनीति के अंधियारों में। सूरज जैसी रौशनी भर दो, कोई तो इनके जीवन के सितारों में। देखें कोरोना पर और कविता  kavitaunsune.blogspot.com पर https://kavitaunsune.blogspot.com/2020/06/blog-post_6.html स्याह रात भर कितनों की ज़िंदगी, मचलती है सड़कों पर नंगे बदन। इनके परिवारों से मिलाकर इन्हें, कोई तो कर दो इनको मग्न। क्यों ग़रीबी मुक्त भारत का नारा, नेता देतें हैं अनेक सेमिनारों में। सपनों में अमीर होते-होते गरीब, बिक चुकें है पथ के बाज़ारों में। एक ज़माना गुज़र गया उन्हें, घर का बना खाना खाने में। माँ के साथ रात को बैठकर, जीवन की सारी बातें बतलाने में। आज के कठिन दौर में, शहरों से निकाला मक्कारों ने। बेबसी में मज़बूर-मज़दूर, चल दिए पैदल ही अंगारों में। कब तक थमेगा ज़िन्दगी का दौर, कब तक कितना पैदल चलेंगे और। इनकी भी मजबूरियों पर, साहब क्यों नही करते ...

शहीद जवान(विदाई)

कौन कहता है कि, बेटे विदा नहीं होते। जब होते हैं विदा, तब सभी हैं रोते। बेटियाँ तो विदा होकर, पा लेती हैं दूसरा परिवार। बेटे जब विदा होते हैं, तो छोड़ जाते है संसार। कौन कहता है कि, बेटे विदा नहीं होते। बेटियों का दो घरों पर, हो जाता है अधिकार। बेटे सरहद पर रात भर, घर आने का करते हैं विचार। माना कि बेटियों के आने से, घर जाता है चहक। वर्षों बाद बेटों के आने पर भी, गली,गांव,आँगन जाता है महक। कौन कहता है कि, बेटे विदा नही होते। बेटियों की विदाई से, खुश होता है परिवार। बेटों की विदाई में, टूट जाता है परिवार। बेटियों को पीहर में, मिलता है स्नेह और प्यार। बेटों को सरहद पर, मिलते हैं हथियार। कौन कहता है कि, बेटे विदा नहीं होते। बेटियों ने अगर घर को, खुशियों से सजाया। बेटों ने भी देश की रक्षा में , अपनी जान को है गवाया। बेटियाँ तो त्यौहार को, परिवार संग है मनाती। बेटों की तो रातों की, नींद है उड़ जाती। कौन कहता है कि, बेटे विदा नहीं होते। कभी-कभी बेटे भी, ऐसे है विदा होते। घर वालों चेहरा भी, नही हैं दिखा पाते। कुछ सोते हुए, सोते ही हैं रह जाते। कु...