Posts

हाँ मैं भी किसान हूँ

हाँ मैं भी किसान हूँ हाँ मै भी किसान हूँ धरा का सीना चीर बीज बोता हूँ पूस की रातों में खेतों पर मैं सोता हूँ फसलों को अपनी मैं कीट और जानवरों से बचाता हूँ मई,जून की धूप अगस्त की बरखा सब आसानी से सहता हूँ लेकिन हर बार सियासत में क्यों मुज़रिम बन जाता हूँ रोटी,कपड़ा,मकां को किसान होकर भी तरस जाता हूँ आज का युवा किसान शहरों की ओर रुख मोड़ गया लहलहाती फसलों की भूमि को बंजर बना कर छोड़ गया बापस लाकर उन्हें शहर से हरियाली वही चाहता हूँ नई तकनीक से अब मैं भी फसलें खूब उगाता हूँ लेकिन कृषि कानून से मैं भी बहुत परेशान हूँ कहने को छोटा ही सही हाँ मैं भी एक किसान हूँ अन्नदाता कहकर अब हमसे दाना छीन रहे आने वाली नस्लों का क्यों खेती से मुख मोड़ रहे दिखाकर तानाशाही क्यों किसानों का गला दबाया है देखकर कृषि कानून किसान खून के आंसू रोया है देश में लूट जैसी योजनाओं से मैं भी क्या अन्जान हूँ अधिकार अपना लेकर रहेंगे हाँ मैं भी एक किसान हूँ

पड़ाव मिलेगा

जब तक चलेंगी ज़िन्दगी की सांसे, कहीं प्यार कहीं टकराव मिलेगा। कहीं बनेंगे सम्बन्ध अंतर्मन से तो, कहीं आत्मीयता का आभाव मिलेगा। कहीं मिलेगी ज़िन्दगी में प्रशंसा तो, कहीं नाराजगियों का व्यवहार मिलेगा। कहीं मिलेगी सच्चे मन से दुआ तो, कहीं भावनाओं में दुर्भाव मिलेगा। कहीं बनेगें पराए रिश्ते भी अपने तो, कहीं अपनों से ही खिंचाव मिलेगा। कहीं होंगी खुशामदें चेहरे पर तो, कहीं पीठ पर बुराई का घाव मिलेगा। तू चला चल राही अपने कर्म पथ पर, जैसा तेरा भाव वैसा प्रभाव मिलेगा। रख स्वभाव में शुद्धता का 'स्पर्श' तू, अवश्य ज़िन्दगी का पड़ाव मिलेगा।

जिंदगी

जिंदगी में हर कठिनाई को सहना पड़ता है, जिस हाल में हैं उसी हाल में रहना पड़ता है। ये ज़िन्दगी बरसात के पानी की तरह है, जिसे वक्त के बहाव के साथ बहना पड़ता है। चाहें कितने ही बुलंद हो इरादे, एक दिन उन्हें भी डगमगाना पड़ता है। दिल के संमन्दर में जब इश्क उठने लगे, तब शर्म के पल्ले को भी हटाना पड़ता है। चाहें कितनी भी धन दौलत हो पास, एक दिन उसे छोंड़ इस जहां से जाना पड़ता है। कितना भी दिल का कठोर हो इंसा, उसके आसुंओं को आंख से बह जाना पड़ता है। कितना भी ज्ञानी हो कोई आज के जमाने में, उसे भी जीवन पर्यंत सीखना पड़ता है।

परंपराएं क्या सही होती है

परंपराएं मनुष्यों का मनुष्यो पर विश्वास तब होता है जब परंपराओं का वहन किया जाता है। परंपराएं परंपराएं आम के फल की भांति होती है जन्म के समय सबको कड़वी लगती है । कुछ समय बाद खट्टा स्वाद देता है जिससे खटाई प्रिय हो वह उसका स्वीकार कर लेता है और फिर कुछ समय पश्चात वहीं फल सबको मधुर लगने लगता है और सबका प्रिय बन जाता है किंतु एक समय आने के बाद वह गल जाता है उसमें से दुर्गंध आने लगती है खाने वाले को रोग लग जाता है और अंत में रह जाती है सुखी गुठली। और वह फल की सूखी गुठली किसी के काम नहीं आता। मुझे परंपराओं से कोई विरोध नहीं है किंतु परंपराएं जब शोषण का कारण बन जाए , सुख के बदले दुख देने लगे तो उस परंपरा को भूमि में गाड़कर नई परंपरा को जन्म देना ही होता है। अब कौन सी परंपरा सही है और कौन सी परंपरा गलत यह निश्चित कौन करता है आप या मैं? जी नहीं !! समय निश्चित करता है और समय का विधान सब को मानना पड़ता है और समय के इस चक्र में आप किस पक्ष में होंगे इसका निर्णय आपको करना है । क्योंकि समय की चक्की में सब पीस जाते हैं। अधर्म के मार्ग पर चलने वाले इस परिवर्तन का आरंभ करते हैं और धर्म...

बेटियाँ

ज़िम्मेदारी के बोझ तले, दब रही हैं आजकल बेटियाँ। नम आँखों से फ़ोन पर, पीहर में हँसकर बात करती हैं बेटियाँ। हुआ करती थीं कभी माँ-बापू की जान, आज अकेले ही सब दुःख सहती हैं बेटियाँ। मन पीहर में शरीर ससुराल में, ये कभी जताती नही हैं बेटियाँ। पीहर आने के लिए , आजकल कितनी तरसती हैं बेटियाँ। घर गृहस्थी बसाने में ही, दिन रात लगी रहती हैं बेटियाँ। ससुराल की सभी परेशानी, Similar poem https://kavitaunsune.blogspot.com/2020/05/blog-post_21.html क्यों चुपचाप सहती हैं बेटियाँ। क्यों अपनी इच्छाओं का गला घोटकर, संस्कारी बन जाती हैं बेटियाँ। कभी बेटों को भी सिखाओ संस्कार, मान मर्यादा के लिए जान गवाती हैं बेटियाँ। कर लेते हैं मस्ती और पार्टी बेटे, घर से भर क़दम भी नही रखती हैं बेटियाँ। दिन में आराम कर लेते हैं बेटे, दो मिनट सुस्ताती भी नही हैं बेटियाँ। पीहर में कुछ हो जाए तो, सब कुछ छोड़ घर आती हैं बेटियाँ। अफ़सोस! कितना कुछ सह कर, चुपचाप दुनिया से चली जाती हैं बेटियाँ।

करोना वायरस पर दमदार कविता

जनवरी बीता खुशियों में, फरबरी में खुमारी छाई। मार्च बीता डर-डर कर, अप्रैल में लॉक डाउन की बारी आई। कोरोना ने देश में तबाही मचाई, घर में रहने से लोगों में उम्मीद जगाई। मई में कोरोना ने गति बढ़ाई, फिर अम्फान तूफ़ान ने तबाही मचाई। जून में अनलॉक वन आया, साथ में निसर्ग तूफ़ान लाया। जुलाई में शायद मिले कुछ आज़ादी, अन्न की न करना अब बर्बादी। More poems on corona virus https://kavitaunsune.blogspot.com/2020/05/blog-post_20.html अगस्त में भाई बहन होंगे साथ, होंगे बहन भाई के हाथों में हाथ। सितम्बर तक भाग जाए कोरोना शैतान, फिर शायद ज़िन्दगी हो जाए कुछ आसान। अक्टूबर करेंगे कोरोना वारियर्स को समर्पित, देश के सभी योद्धाओं को अर्पित। नवम्बर में हम सब फिर होंगे साथ, मिलकर दीपक जलाएंगे दिवाली की रात। दिसम्बर में करेंगे ईश्वर से प्राथना, आए न कोई भी वर्ष फिर ऐसा अपना। (मान सिंह कश्यप रामपुर उ०प्र०)

पर्यावरण सन्देश

जन-जन तक सन्देश फैलाएं मिलकर हम सब पर्यावरण बचाएं मिलकर सब एक कदम उठाएं वाहनों पर अंकुश लगाएं एक सुन्दर सा देश बनाएं कट रहे हैं जंगल वन शिथिल पड़ गया है मानव मन ज़हरीली हो गई हैं फिजाएं मिलकर हम सब पर्यावरण बचाएं प्लास्टिक का उपयोग छोंड़ दें सब पैदल की ओर रुख मोड़ दें सब हवा चाहिए सबको शुद्ध इसके लिए आपस में करते हैं युद्ध वृक्ष न कोई लगायेगा लेकिन मीठे फल पहले खायेगा चलो शरीर को स्वास्थ्य बनाएं जन-जन तक एक संदेश फैलाएं पुष्प सभी के मन को भाते हैं फिर भी मनुष्य पेड़ नही लगाते हैं ऐसे ही जल को व्यर्थ गवांओगे एक दिन जल के लिए तरस जाओगे हाथी जैसे जानवर को बारूद तुम खिलाओगे एक दिन फिर तुम भी जानवर बन जाओगे हम सब प्रकृति का सम्मान करें पर्यावरण का मिलकर अब ध्यान करें जन-जन तक एक सन्देश फैलाएं मिलकर हम सब पर्यावरण बचाएं (मान सिंह कश्यप रामपुर उ०प्र०)